अंतरराष्ट्रीय कर (International Tax) प्रणाली: एक विस्तृत और अनोखी अंतर्दृष्टि

अंतरराष्ट्रीय कर (International Tax) प्रणाली: एक विस्तृत और अनोखी अंतर्दृष्टि

परिचय

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली (International Taxation) एक जटिल और महत्वपूर्ण विषय है जो वैश्वीकरण के युग में और भी प्रासंगिक हो गया है। यह प्रणाली विभिन्न देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब व्यक्ति, कंपनियां या संगठन एक से अधिक देशों में आर्थिक गतिविधियां संचालित करते हैं, तो उनके सामने कराधान से संबंधित कई चुनौतियां आती हैं। यह लेख अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली के विभिन्न पहलुओं, इसके सिद्धांतों, चुनौतियों, और भारत के संदर्भ में इसके महत्व पर विस्तार से चर्चा करता है।

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली क्या है?

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली से तात्पर्य उन नियमों, नीतियों और समझौतों से है जो विभिन्न देशों के बीच कराधान से संबंधित मामलों को नियंत्रित करते हैं। यह प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि वैश्विक व्यापार और निवेश में करों का उचित और निष्पक्ष वितरण हो। इसमें आयकर, कॉर्पोरेट कर, पूंजीगत लाभ कर, और अन्य कर शामिल हो सकते हैं जो सीमा-पार लेनदेन से उत्पन्न होते हैं। अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली का मुख्य उद्देश्य दोहरे कराधान (Double Taxation) से बचना, कर चोरी को रोकना, और वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को सुचारू रूप से संचालित करना है।

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली के सिद्धांत

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है, जो निम्नलिखित हैं:

  1. निवास सिद्धांत (Residence Principle): इस सिद्धांत के अनुसार, कोई व्यक्ति या कंपनी जिस देश में निवासी है, उसे अपनी वैश्विक आय पर उस देश में कर देना पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई भारतीय कंपनी विदेश में आय अर्जित करती है, तो उसे भारत में उस आय पर कर देना होगा।
  2. स्रोत सिद्धांत (Source Principle): इस सिद्धांत के तहत, आय पर कर उस देश में लगाया जाता है जहां आय उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई विदेशी कंपनी भारत में व्यापार करती है, तो भारत में उत्पन्न आय पर भारत में कर लागू होगा।
  3. निष्पक्षता और समानता: अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कराधान निष्पक्ष हो और किसी भी देश या करदाता के साथ भेदभाव न हो।
  4. दोहरे कराधान से बचाव: विभिन्न देशों के बीच दोहरे कराधान समझौते (Double Taxation Avoidance Agreements – DTAA) इस सिद्धांत को लागू करने में मदद करते हैं। ये समझौते यह सुनिश्चित करते हैं कि एक ही आय पर दो देशों में कर न लगाया जाए।

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली के प्रमुख घटक

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली में कई महत्वपूर्ण घटक शामिल हैं, जो इसे और अधिक जटिल और व्यापक बनाते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:

1. दोहरे कराधान से बचाव समझौते (DTAA)

DTAA विभिन्न देशों के बीच किए गए द्विपक्षीय समझौते हैं, जो दोहरे कराधान को रोकने और कर चोरी को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। भारत ने 90 से अधिक देशों के साथ DTAA पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर, और जापान जैसे देश शामिल हैं। ये समझौते करदाताओं को यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि उनकी आय पर केवल एक देश में कर लगे।

2. स्थानांतरण मूल्य निर्धारण (Transfer Pricing)

स्थानांतरण मूल्य निर्धारण एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों (Multinational Corporations – MNCs) से संबंधित है। यह सुनिश्चित करता है कि एक ही संगठन की विभिन्न इकाइयों के बीच लेनदेन बाजार मूल्य पर हो। उदाहरण के लिए, यदि एक भारतीय कंपनी अपनी विदेशी सहायक कंपनी को सामान बेचती है, तो उस सामान की कीमत बाजार मूल्य के अनुसार होनी चाहिए, ताकि कर चोरी से बचा जा सके। भारत में स्थानांतरण मूल्य निर्धारण नियम आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 92 के तहत लागू किए जाते हैं।

3. कर स्वर्ग (Tax Havens)

कर स्वर्ग वे देश या क्षेत्र हैं जो कम या शून्य कर दरों की पेशकश करते हैं। उदाहरण के लिए, बरमूडा, केमैन आइलैंड्स, और स्विट्जरलैंड जैसे देश कर स्वर्ग के रूप में जाने जाते हैं। ये देश कंपनियों और व्यक्तियों को अपनी आय को कम कर दरों वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित करने का अवसर प्रदान करते हैं। हालांकि, यह कर चोरी और अवैध धन के प्रवाह को बढ़ावा दे सकता है।

4. आधार अपरदन और लाभ स्थानांतरण (BEPS)

BEPS (Base Erosion and Profit Shifting) एक ऐसी रणनीति है जिसका उपयोग बहुराष्ट्रीय कंपनियां कर आधार को कम करने और लाभ को कम कर दर वाले देशों में स्थानांतरित करने के लिए करती हैं। OECD और G20 ने BEPS को नियंत्रित करने के लिए 15 कार्रवाई बिंदुओं का एक ढांचा विकसित किया है, जिसे भारत ने भी अपनाया है।

भारत में अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली

भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, और अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली इसके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ने वैश्विक व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

1. आयकर अधिनियम, 1961

भारत में अंतरराष्ट्रीय कराधान को आयकर अधिनियम, 1961 के तहत नियंत्रित किया जाता है। इस अधिनियम की धारा 90 और 91 DTAA और एकतरफा कर राहत से संबंधित हैं। धारा 90 DTAA के तहत कर राहत प्रदान करती है, जबकि धारा 91 उन देशों के लिए राहत प्रदान करती है जिनके साथ भारत का DTAA नहीं है।

2. सामान्य कर चोरी विरोधी नियम (GAAR)

भारत ने 2017 में सामान्य कर चोरी विरोधी नियम (General Anti-Avoidance Rules – GAAR) लागू किए, जो कर चोरी को रोकने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। GAAR उन लेनदेन को लक्षित करता है जो केवल कर बचाने के उद्देश्य से किए जाते हैं।

3. मल्टीलैटरल इंस्ट्रूमेंट (MLI)

भारत ने OECD के मल्टीलैटरल इंस्ट्रूमेंट (Multilateral Instrument) को अपनाया है, जो BEPS को लागू करने के लिए मौजूदा DTAA को संशोधित करता है। यह भारत को कर चोरी और कर स्वर्गों से निपटने में मदद करता है।

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली की चुनौतियां

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली कई चुनौतियों का सामना करती है, जो इसकी जटिलता को और बढ़ाती हैं:

  1. कर चोरी और कर बचाव: बहुराष्ट्रीय कंपनियां और धनी व्यक्ति अक्सर कर स्वर्गों का उपयोग करके कर चोरी करते हैं। इससे विकासशील देशों को राजस्व का नुकसान होता है।
  2. जटिल नियम और अनुपालन: विभिन्न देशों के कर नियमों में भिन्नता के कारण कंपनियों को अनुपालन में कठिनाई होती है।
  3. डिजिटल अर्थव्यवस्था: डिजिटल कंपनियों जैसे गूगल, फेसबुक, और अमेज़न के लिए कराधान एक नई चुनौती है। इन कंपनियों की कोई भौतिक उपस्थिति नहीं होती, फिर भी वे विभिन्न देशों में आय अर्जित करती हैं। OECD ने डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए कर नियम विकसित करने का प्रयास किया है।
  4. वैश्विक सहयोग की कमी: विभिन्न देशों के हितों में टकराव के कारण वैश्विक कर सहयोग में बाधाएं आती हैं।

भारत के लिए भविष्य की संभावनाएं

भारत में अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली को और मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं:

  1. डिजिटल कर प्रणाली: भारत ने डिजिटल सेवाओं पर कर (Equalization Levy) लागू किया है, जो डिजिटल अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसे और प्रभावी बनाया जा सकता है।
  2. कर प्रशासन में सुधार: कर प्रशासन को और पारदर्शी और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने की आवश्यकता है।
  3. वैश्विक सहयोग: भारत को OECD और G20 जैसे संगठनों के साथ मिलकर BEPS और अन्य कर सुधारों को लागू करना चाहिए।

निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय कर प्रणाली वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो विभिन्न देशों के बीच आर्थिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करती है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह प्रणाली विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राजस्व संग्रह, निवेश को बढ़ावा देने, और कर चोरी को रोकने में मदद करती है। हालांकि, इस प्रणाली में कई चुनौतियां भी हैं, जिन्हें वैश्विक सहयोग और तकनीकी नवाचार के माध्यम से हल किया जा सकता है। भारत ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, और भविष्य में इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है।


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